रविवार, 1 मई 2011

BhagvatGita-02-53


मूल स्लोकः

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।

समाधावचला बुध्दिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।2.53।।




English translation by Swami Sivananda
2.53 When thy intellect, which is perplexed by the Veda text, which thou hast read, shall stand immovable and steady in the Self, then thou shalt attain Self-realisation.


English commentary by Swami Sivananda
2.53 श्रुतिविप्रतिपन्ना perplexed by what hast heard, ते thy, यदा when, स्थास्यति shall stand, निश्चला immovable, समाधौ in the Self, अचला steady, बुद्धिः intellect, तदा then, योगम् Self-realisation, अवाप्स्यसि (thou) shalt attain.Commentary: When your intellect which is tossed about by the conflict of opinions regarding the Pravritti Marga (the path of action) and the Nivritti Marga (the path of retirement or renunciation) has become immovable without distraction and doubt and firmly established in the Self, then thou shalt attain Self-realisation or knowledge of the Self (Atma-Jnana).



Hindi translation by Swami Ram Sukhdas
जिस कालमें शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मामें अचल हो जायगी, उस कालमें तू योगको प्राप्त हो जायगा ।।2.53।।


Hindi commentary by Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- लौकिक मोहरूपी दलदलको तरनेपर भी नाना प्रकारके शास्त्रीय मतभेदोंको लेकर जो मोह होता है, उसको तरनेके लिये भगवान् इस श्लोकमें प्रेरण करते हैं।श्रुतिविप्रतिपन्ना ते ... तदा योगमवाप्स्यसि -- अर्जुनके मनमें यह श्रुतिविप्रतिपत्ति है कि अपने गुरुजनोंका, अपने कुटुम्बका नाश करना भी उचित नहीं है और अपने क्षात्रधर्म-(युद्ध करने-) का त्याग करना भी उचित नहीं है। एक तरफ तो कुटुम्बकी रक्षा हो और एक तरफ क्षात्रधर्मका पालन हो -- इसमें अगर कुटुम्बकी रक्षा करें तो युद्ध नहीं होगा और युद्ध करें तो कुटुम्बकी रक्षा नहीं होगी -- इन दोनों बातोंमें अर्जुनकी श्रुतिविप्रतिपत्ति है, जिससे उनकी बुद्धि विचलित हो रही। (टिप्पणी प0 91) अतः भगवान् शास्त्रीय मतभेदोंमें बुद्धिको निश्चल और परमात्मप्राप्तिके विषयमें बुद्धिको अचल करनेकी प्रेरणा करते हैं।पहले तो साधकमें इस बातको लेकर सन्देह होता है कि सांसारिक व्यवहारको ठीक किया जाय या परमात्माकी प्राप्ति की जाय? फिर उसका ऐसा निर्णय होता है कि मुझे तो केवल संसारकी सेवा करनी है और संसारसे लेना कुछ नहीं है। ऐसा निर्णय होते ही साधककी भोगोंसे उपरति होने लगती है, वैराग्य होने लगता है। ऐसा होनेके बाद जब साधक परमात्माकी तरफ चलता है, तब उसके सामने साध्य और साधन-विषयक तरह-तरहके शास्त्रीय मतभेद आते हैं। इससे ' मेरेको किस साध्यको स्वीकार करना चाहिये और किस साधन-पद्धतिसे चलना चाहिये ' -- इसका निर्णय करना बड़ा कठिन हो जाता है। परन्तु जब साधक सत्सङ्गके द्वारा अपनी रुचि, श्रद्धा-विश्वास और योग्यताका निर्णय कर लेता है अथवा निर्णय न हो सकनेकी दशामें भगवान्के शरण होकर उनको पुकारता है, तब भगवत्कृपासे उसकी बुद्धि निश्चल हो जाती है। दूसरी बात, सम्पूर्ण शास्त्र, सम्प्रदाय आदिमें जीव, संसार और परमात्मा -- इन तीनोंका ही अलग-अलग रूपोंसे वर्णन किया गया है। इसमें विचारपूर्वक देखा जाय तो जीवका स्वरूप चाहे जैसा हो, पर जीव मैं हूँ -- इसमें सब एकमत हैं; और संसारका स्वरूप चाहे जैसा हो, पर संसारको छोड़ना है -- इसमें सब एकमत हैं; और परमात्माका स्वरूप चाहे जैसा हो, पर उसको प्राप्त करना है -- इसमें सब एकमत हैं। ऐसा निर्णय कर लेनेपर साधककी बुद्धि निश्चल हो जाती है। मेरेको केवल परमात्माको ही प्राप्त करना है -- ऐसा दृढ़ निश्चय होनेसे बुद्धि अचल हो जाती है। तब साधक सुगमतापूर्वक योग -- परमात्माके साथ नित्ययोगके प्राप्त हो जाता है।शास्त्रीय निर्णय करनेमें अथवा अपने कल्याणके निश्चयमें जितनी कमी रहती है, उतनी ही देरी लगती है। परन्तु इन दोनोंमें जब बुद्धि निश्चल और अचल हो जाती है, तब परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव हो जाता है।संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये बुद्धि ' निश्चल ' होनी चाहिये, जिसको छठे अध्यायके तेईसवें श्लोकमें दुःखसंयोगवियोगम् पदसे कहा गया है; और परमात्मासे सम्बन्ध जोड़नेके लिये बुद्धि ' अचल ' होनी चाहिये, जिसको दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें ' समत्वं योग उच्यते ' पदोंसे कहा गया है।यहाँ तदा योगमवाप्स्यसि पदोंसे जो योगकी प्राप्ति बतायी है, वह योग ऐसा नहीं है कि पहले परमात्मासे वियोग था, उस वियोगको मिटा दिया तो योग हो गया, प्रत्युत असत् पदार्थोंके साथ भूलसे माने हुए सम्बन्धका सर्वथा वियोग हो जानेका नाम ' योग ' है अर्थात् मनुष्यकी सदासे जो वास्तविक स्थिति (परमात्मासे नित्ययोग) है, उस स्थितिमें स्थित होना योग है। वह वास्तविक स्थिति ऐसी विलक्षण है कि उससे कभी वियोग होता ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं। उसमें संयोग, वियोग, योग यादि कोई भी शब्द लागू नहीं होता। केवल असत्से माने हुए सम्बन्धके त्यागको ही यहाँ योग संज्ञा दे दी है। वास्तवमें यह योग नित्ययोगका वाचक है। इस नित्ययोगकी अनुभूति कर्मोंके (सेवाके) द्वारा की जाय तो ' कर्मयोग ', विवेक-विचारके द्वारा की जाय तो ' ज्ञानयोग ', प्रेमके द्वारा की जाय तो ' भक्तियोग ', संसारके लय-चिन्तनके द्वारा की जाय तो ' लययोग ', प्राणायामके द्वारा की जाय तो ' हठयोग' और यम-नियमादि आठ अङ्गोंके द्वारा की जाय तो ' अष्टाङ्गयोग' कहलाता है।सम्बन्ध -- मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्ति दूर होनेपर योगको प्राप्त हुए स्थिर बुद्धिवाले पुरुषके विषयमें अर्जुन प्रश्न करते हैं ।।2.53।।


Sanskrit commentary by Sri Sankaracharya
-- श्रुतिविप्रतिपन्ना अनेकसाध्यसाधनसंबन्धप्रकाशनश्रुतिभिः श्रवणैः प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणैः विप्रतिपन्ना नानाप्रतिपन्ना विक्षिप्ता सती ते तव बुद्धिः यदा यस्मिन् काले स्थास्यति स्थिरीभूता भविष्यति निश्चला विक्षेपचलनवर्जिता सती समाधौ, समाधीयते चित्तमस्मिन्निति समाधिः आत्मा, तस्मिन् आत्मनि इत्येतत्। अचला तत्रापि विकल्पवर्जिता इत्येतत्। बुद्धिः अन्तःकरणम्। तदा तस्मिन्काले योगम् अवाप्स्यसि विवेकप्रज्ञां समाधिं प्राप्स्यसि।।प्रश्नबीजं प्रतिलभ्य अर्जुन उवाच लब्धसमाधिप्रज्ञस्य लक्षणबुभुत्सया -- अर्जुन उवाच -- ।।2.53।।



English translation by Swami Gambhirananda (on Sri Sankaracharya's Sanskrit Commentary)
2.53 If it be asked, 'By becoming possessed of the wisdom arising from the discrimination about the Self after overcoming the turbidity of delusion, when shall I attain the yoga of the supreme Reality which is the fruit that results from Karma-yoga?', then listen to that; Yada, when at the time when; te, your; buddhih, mind; that has become sruti-vi-pratipanna, bewildered, tossed about, by hearing (the Vedas) that reveal the diverse ends, means, and (their) relationship, i.e. are filled with divergent ideas; sthasyati, will become; niscala, unshakable, free from the trubulence in the form of distractions; and acala, steadfast, that is to say, free from doubt even in that (unshakable) state; samadhau, in samadhi, that is to say, in the Self -- samadhi being derived in the sense of that in which the mind is fixed; tada, then, at that time; avapsyasi, you will attain; yogam, Yoga, the enlightenment, Self-absorption, that arises from discrimination.Having got an occasion for inquiry, Arjuna, with a view to knowing the characteristics of one who has the realization of the Self, By the word samadhi is meant the enlightenment arising from discrimination, which has been spoken of in the commentary on the previous verse. The steadfastness which the monks have in that enlightenment is called steadfastness in Knowledge. Or the phrase may mean, 'the enlightenment achieved through meditation on the Self', i.e. the realization of the supreme Goal. asked:



Hindi translation by Sri Harikrishandas Goenka (on Sri Sankaracharya's Sanskrit Commentary)
यदि तू पूछे कि मोहरूप मलिनतासे पार होकर आत्मविवेकजन्य बुद्धिको प्राप्त हुआ मैं, कर्मयोगके फलरूप परमार्थयोगको ( ज्ञानको ) कब पाऊँगा? तो सुन -- अनेक साध्य, साधन और उनका सम्बन्ध बतलानेवाली श्रुतियोंसे विप्रतिपन्न अर्थात् नाना भावोंको प्राप्त हुई -- विक्षिप्त हुई तेरी बुद्धि जब समाधिमें यानी जिसमें चित्तका समाधान किया जाय वह समाधि है, इस व्युत्पत्तिसे आत्माका नाम समाधि है, उसमें अचल और दृढ़ स्थिर हो जायगी यानी विक्षेपरूप चलनसे और विकल्पसे रहित होकर स्थिर हो जायगी। तब तू योगको प्राप्त होगा अर्थात् विवेकजनित बुद्धिरूप समाधिनिष्ठाको पावेगा ।।2.53।।


Sanskrit commentary by Sri Ramanuja
श्रुतिः श्रवणम्; अस्मत्तः श्रवणेन विशेषतः प्रतिपन्ना सकलेतरविसजातीयनित्यनिरतिशयसूक्ष्मतत्त्वविषया स्वयम् अचला एकरूपा बुद्धिः असङ्गकर्मानुष्ठानेन विमलीकृते मनसि यदा निश्चला स्थास्यति तदा योगम् आत्मावलोकनम् अवाप्स्यसि। एतद् उक्तं भवति -- शास्त्रजन्यात्मज्ञानपूर्वककर्मयोगः स्थितप्रज्ञताख्यज्ञाननिष्ठाम् आपादयति, ज्ञाननिष्ठारूपा स्थितप्रज्ञता तु योगाख्यम् आत्मावलोकनं साधयति इति।एवम् उक्तः पार्थो निःसङ्गकर्मानुष्ठानरूपकर्मयोगसाध्यस्थितप्रज्ञतया योगसाधनभूतायाः स्वरूपं स्थितप्रज्ञस्यानुष्ठानप्रकारं च पृच्छति -- ।।2.53।।



English translation by Swami Adidevananda (on Sri Ramanuja's Sanskrit Commentary)
2.53 Here 'Sruti' means hearing (and not the Veda). When your intellect, which, by hearing from us, has become specially enlightened, having for its object the eternal, unsurpassed and subtle self --- which belongs to a class different from all other entities ---, then the intellect is firmly fixed, i.e., in a single psychosis and stands unshaken. In such a concentrated mind, purified by the performance of duties without attachment, will be generated true Yoga, which consists in the vision of the self. What is said is this: Karma Yoga, which presupposes the knowledge of the real nature of the self obtained from the scriptures, leads to a firm devotion to knowledge known as the state of firm wisdom; and the state of 'firm wisdom;' which is in the form of devotion to knowledge, generates the vision of the self; this vision is here called Yoga.Arjuna, thus taught, questions about the nature of 'firm wisdom' which constitutes the means for the attainment of Yoga and which itself is attainable through Karma Yoga which consists in work with detachment, and also about the mode of behaviour of a man of 'firm wisdom.'


Sanskrit commentary by Sri Vallabhacharya
कदा तत्पदमहं प्राप्स्यामि? इत्यपेक्षायामाह -- यदेति द्वाभ्याम्। निश्चला विशोकधैर्यादिवती ते यदा बुद्धिर्व्यवसायात्मिकैव तदा श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च त्रैगुण्यस्य कर्मफलस्य निर्वेदं वैराग्यं प्राप्स्यसि। तस्यात्रानुपादेयत्वेन जिज्ञासां न करिष्यसीत्यर्थः। तादृशी सती ते बुद्धिरचला यदा समाधीयते तदा योगं योगस्वरूपं यास्यसि; ततश्च कार्यसिद्धिः ।।2.52 -- 2.53।।


Sanskrit commentary by Sri Madhusudan Saraswati
अन्तःकरणशुद्ध्यधैवं जातनिर्वेदस्य कदा ज्ञानप्राप्तिरित्यपेक्षायामाह -- ते तव बुद्धिः श्रुतिभिर्नानाविधफलश्रवणैरविचारिततात्पर्यैर्विप्रतिपन्ना अनेकविधसंशयविपर्यासवत्त्वेन विक्षिप्ता प्राक्, यदा यस्मिन्काले शुद्धिजविवेकजनितेन दोषदर्शनेन तं विक्षेपं परित्यज्य समाधौ परमात्मनि निश्चला जाग्रत्स्वप्नदर्शनलक्षणविक्षेपरहिता, अचला सुषुप्तिमूर्च्छास्तब्धीभावादिरूपलयलक्षणचलनरहिता सती स्थास्यति। लयविक्षेपलक्षणौ दोषौ परित्यज्य समाहिता भविष्यतीति यावत्। अथवा निश्चलाऽसंभावनाविपरीतभावनारहिता अचला दीर्घकालादनैरन्तर्यसत्कारसेवनैर्विजातीयप्रत्ययादूषिता सती निर्वातप्रदीपवदात्मनि स्थास्यतीति योजना। तदा तस्मिन्काले योगं जीवपरमात्मैक्यलक्षणं तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्यमखण्डसाक्षात्कारं सर्वयोगफलमवाप्स्यसि। तदा पुनः साध्यान्तराभावात्कृतकृत्यः स्थितप्रज्ञो भविष्यसीत्यभिप्रायः ।।2.53।।


Sanskrit commentary by Sri Madhvacharya
तदेव स्पष्टयति -- 'श्रुतिविप्रतिपन्नेति'। पूर्वं श्रुतिभिर्वेदैर्विप्रतिपन्ना विरुद्धा सती यदा वेदार्थानुकूलेन तत्त्वनिश्चयेन विपरीतवाग्भिरपि निश्चला भवति, ततश्च समाधावचला। ब्रह्मप्रत्यक्षदर्शनेन भेरीताडनादावपि परमानन्दमग्नत्वात्। तदा योगमवाप्स्यसि उपायसिद्धो भवसीत्यर्थः ।।2.53।।

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